डेनमार्क की संप्रभुता और ग्रीनलैंड: जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो यूरोप को उठना होगा

आज की वैश्विक राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ कल के मित्र आज के प्रतिद्वंद्वी और शायद भविष्य के शिकारी नजर आ रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाला अमेरिका जिस तरह से 'ग्रीनलैंड' को डेनमार्क से छीनने या उसे "एनेक्स" (हड़पने) करने की बात करता है, वह न केवल अंतरराष्ट्रीय कानूनों का मजाक है, बल्कि एक संप्रभु राष्ट्र के अस्तित्व पर सीधा हमला है। यह समय है कि यूरोपीय नाटो (NATO) सदस्य देश एकजुट हों और डेनमार्क की रक्षा के लिए एक अभेद्य दीवार बनकर खड़े हों।

अंतरराष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था का पतन

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया ने एक 'नियम-आधारित व्यवस्था' (Rule-based International Order) बनाई थी। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कोई भी शक्तिशाली देश अपनी सैन्य या आर्थिक शक्ति के बल पर किसी छोटे देश की जमीन नहीं हड़पेगा। लेकिन ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका खुद उन नियमों को पैरों तले कुचल रहा है जिन्हें उसने कभी बनाया था। ग्रीनलैंड कोई बंजर जमीन का टुकड़ा नहीं है जिसे खरीदा या बेचा जा सके; यह डेनमार्क का एक अभिन्न और स्वायत्त हिस्सा है, और वहां रहने वाले लोगों की अपनी गरिमा और पहचान है।

अमेरिका का पाखंड (Hypocrisy)

अमेरिका अक्सर दुनिया भर में लोकतंत्र, मानवाधिकार और संप्रभुता का स्वयंभू रक्षक बनता है। जब रूस ने क्रीमिया पर कब्जा किया, तो अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए। जब चीन दक्षिण चीन सागर में विस्तारवाद दिखाता है, तो अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानून की दुहाई देता है। लेकिन जब बात ग्रीनलैंड की आती है, तो अमेरिका का वही नेतृत्व "औपनिवेशिक मानसिकता" (Colonial Mindset) पर उतर आता है। यह पाखंड की पराकाष्ठा है। आप एक तरफ हमलावर की निंदा नहीं कर सकते और दूसरी तरफ खुद एक छोटे सहयोगी देश की जमीन पर नजर नहीं गड़ा सकते।

ट्रंप: विश्व शांति और स्थापित व्यवस्था के लिए खतरा

डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति 'अमेरिका फर्स्ट' के नाम पर असल में 'अमेरिका अलोन' (अमेरिका अकेला) की ओर बढ़ रही है। उनकी अनिश्चित कार्यशैली और आक्रामक बयानबाजी ने उन्हें विश्व शांति के लिए एक बड़ा खतरा बना दिया है। एक ऐसा नेता जो अपने ही नाटो सहयोगियों को धमकी देता है और अंतरराष्ट्रीय संधियों से पीछे हट जाता है, वह भरोसे के लायक नहीं रह गया है। ग्रीनलैंड को हथियाने की उनकी इच्छा केवल एक व्यापारिक सौदा नहीं है, बल्कि यह एक खतरनाक मिसाल पेश करता है कि अब सीमाएं स्थिर नहीं हैं और ताकतवर अपनी मर्जी थोप सकता है।

अमेरिका की प्रतिष्ठा को पहुंचती क्षति

अमेरिका की सबसे बड़ी शक्ति उसका सैन्य बल नहीं, बल्कि उसका 'सॉफ्ट पावर' और दुनिया भर में बने उसके मजबूत गठबंधन रहे हैं। ट्रंप के शब्दों और उनके कार्यों ने दशकों में बनी इस प्रतिष्ठा को धूल में मिला दिया है। आज यूरोपीय देशों में अमेरिका को एक "भरोसेमंद साथी" के बजाय एक "धमकाने वाले पड़ोसी" के रूप में देखा जा रहा है। यदि अमेरिका ग्रीनलैंड जैसे अवैध अधिग्रहण की कोशिश करता है, तो वह दुनिया के मंच पर अपनी रही-सही नैतिक साख भी खो देगा।

यूरोप की जिम्मेदारी: नाटो की असली परीक्षा

अब गेंद यूरोपीय देशों के पाले में है। जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय नाटो सदस्यों को यह समझना होगा कि आज अगर डेनमार्क के ग्रीनलैंड पर खतरा है, तो कल उनकी अपनी सीमाओं पर भी सवाल उठ सकते हैं। यूरोप को अब वाशिंगटन की ओर देखना बंद करना होगा और अपनी सुरक्षा खुद सुनिश्चित करनी होगी।

यूरोप को डेनमार्क को यह स्पष्ट आश्वासन देना चाहिए कि:

1. ग्रीनलैंड की सुरक्षा के लिए यूरोपीय सेनाएं प्रतिबद्ध हैं।

2. किसी भी प्रकार के अमेरिकी दबाव या आर्थिक प्रतिबंधों का जवाब एकजुट होकर दिया जाएगा।

3. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) और संयुक्त राष्ट्र में डेनमार्क की संप्रभुता का पुरजोर समर्थन किया जाएगा।

निष्कर्ष

ग्रीनलैंड डेनमार्क का है और हमेशा रहेगा। ट्रंप के नेतृत्व वाला अमेरिका अगर विस्तारवाद की राह पर चलता है, तो उसे यह जान लेना चाहिए कि २१वीं सदी में दुनिया अब 'जंगल राज' को स्वीकार नहीं करेगी। यूरोप के लिए यह केवल डेनमार्क को बचाने की लड़ाई नहीं है, बल्कि उस अंतरराष्ट्रीय सभ्यता और न्यायप्रिय व्यवस्था को बचाने की लड़ाई है, जिसके लिए लाखों लोगों ने बलिदान दिया है।